क्या 2022 का राजनीतिक परिवर्तन 2024 में सत्ता में बदलाव लाएगा?

 

योगेन्द्र यादव

 

क्या जनमानस के बदलाव पर जनादेश की मोहर लगेगी? नए वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यही रहेगा। सन 2023 संक्रमण का साल है, 2022 की गूंज और 2024 की आहट के बीच अटका हुआ साल। इस साल सबकी निगाहें एक सवाल पर अटकी रहेंगी। क्या 2022 में जो राजनीतिक परिवर्तन शुरू हुआ है वह 2024 आते-आते सत्ता परिवर्तन का स्वरूप लेगा?

 

बीते हुए वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना उत्तर प्रदेश और गुजरात के चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत या फिर पंजाब, दिल्ली या हिमाचल में उसकी हार नहीं थी। इन सभी चुनावों की हार-जीत उसी खांचे के भीतर थी जो वर्ष 2014 से देश में चला आ रहा है। अगर इस वर्ष की कोई सबसे बड़ी राजनीतिक घटना थी तो वह ‘भारत जोड़ो यात्रा’ थी जिसने पिछले आठ साल के चल रहे ढर्रे को चुनौती दी, जनमानस को झकझोरा।

 

अभी से यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि देश का जनमानस पलट गया है, या जनता मोदी राज के खिलाफ हो गई है, या कि आर.एस.एस. और भाजपा का वैचारिक वर्चस्व टूट गया है। मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि देश के दिल पर नफरत और दिमाग पर झूठ का जो पर्दा पड़ा हुआ था उसमें छेद हो गया है, ‘पप्पू’ नामक छवि वाला स्टिकर अब उखड़ गया है और उसके नीचे छुपा हुआ सच धीरे-धीरे दिखने लगा है।

 

आज से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का अंतिम चरण शुरू हो रहा है। अब तक लगभग 2800 किलोमीटर पूरा कर चुकी यह पदयात्रा इस महीने के अंत तक दिल्ली से चलकर श्रीनगर तक पहुंचेगी। राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में मिले विशाल जनसमर्थन के बाद अब उत्तर भारत के राष्ट्रीय मीडिया को भी मजबूरन इस यात्रा को स्थान देना पड़ा है। अब राहुल गांधी की आवाज को नजरअंदाज करना संभव नहीं रहा है, इसलिए अब आने वाले दिनों में यात्रा का संदेश एक व्यापक जनमानस तक पहुंचने की संभावना बनी है। श्रीनगर में यह यात्रा तो पूर्ण हो जाएगी लेकिन यह तय है कि जनता से सीधे जुडऩे का यह सिलसिला उसके बाद भी जारी रहेगा। इस यात्रा को एक सतत् अभियान में बदलने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। अगर ये प्रयास गति पकड़ते हैं तो यह तय है कि आने वाला साल भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है।

 

इसका तात्कालिक कारण अर्थव्यवस्था की दुर्गति हो सकता है। फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, महंगाई पर काबू पाने का सरकार के पास कोई तरीका नहीं है, बेरोजगारी कई दशकों की चरम सीमा पर पहुंच चुकी है और उतरने का नाम नहीं ले रही, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रुपया लुढ़कता जा रहा है, एक तरफ गरीब के लिए रसोई चलाना मुश्किल हो रहा है तो अडानी और अंबानी का साम्राज्य फैलता चला जा रहा है। यह सरकार ‘हम दो, हमारे दो’ की सरकार है इस छवि को तोड़ना मुश्किल होता जा रहा है। उधर चीन के आक्रामक तेवर जारी हैं, हमारे सुरक्षा बलों की बहादुरी की आड़ में सरकार के सामरिक और विदेश नीति की असफलता को ढकना मुश्किल होता जा रहा है। लाख कोशिशों के बाद भी यह सच छुपाना दुश्वार होता जा रहा है कि इस सरकार के कार्यकाल में चीन हमारी 100 किलोमीटर जमीन हड़प चुका है।

 

फिलहाल इन सब बातों का असर बहुत ध्यान देने पर ही दिखाई दे रहा है। बदलाव की बयार बहुत आहिस्ता ही बह रही है। अभी तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का असर कुछ ही इलाकों और वर्गों तक सीमित है। देश के अधिकांश इलाकों में अंतिम घर तक इस यात्रा का संदेश नहीं पहुंचा है। अगर जनमत सर्वेक्षण किया जाए तो शायद आज भी भाजपा बहुमत में दिखाई देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार दिखाई दे सकती है। लेकिन अब हम जनमत की यात्रा के उस नाजुक ङ्क्षबदू पर पहुंच रहे हैं जहां से आगे तीखा मोड़ है। यूं कहिए कि पाप का घड़ा कभी भी भर सकता है, ताश के पत्तों का महल कभी भी ढह सकता है।

 

इस साल होने वाले नौ विधानसभा चुनावों में हवा के रुख का कुछ अनुमान लगेगा। अगर जनमत का रुझान बदल रहा है तो उसकी एक झलक कुछ बड़े राज्यों के जनादेश में दिखाई देनी चाहिए। पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों के चुनाव की अपनी लय और गति रहती है, लेकिन अन्य बड़े राज्यों के परिणाम में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनके मुकाबले कांग्रेस और राहुल गांधी की बदली छवि की ताकत का अनुमान लगाया जा सकेगा। पहला बड़ा इम्तिहान इस वर्ष अप्रैल-मई में कर्नाटक में होगा।

 

पिछले 30 सालों से दक्षिण के इस द्वार में प्रवेश पाने के बावजूद आज तक भाजपा इस राज्य में चुनाव में पूर्ण बहुमत पाने में असफल रही है। सरकार बनाने के लिए भाजपा ने यहां हमेशा ‘आप्रेशन कमल’ के तहत विधायकों की खरीद-फरोख्त वाले चोर दरवाजे का सहारा लिया है। उसके लिए चुनौती होगी इस बार चुनाव के बल पर बहुमत की सरकार बनाना। राज्य में भाजपा सरकार के निकम्मेपन और भारी भ्रष्टाचार की छवि के चलते कांग्रेस के लिए एक बड़ा अवसर है। इसीलिए कभी हिजाब तो कभी आजान के बहाने भाजपा राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खुला सहारा ले रही है।

 

अंत में एक वैधानिक चेतावनी: उपरोक्त विश्लेषण तभी लागू होता है अगर जनमानस से जनादेश की यात्रा सहज, स्वाभाविक और लोकतांत्रिक  तरीके से हो सके। राजनीति की जानकारी रखने वाले अधिकांश लोगों को डर है कि शायद ऐसा होने न पाए। आशंका है कि इस बीच जनमानस को दिग्भ्रमित करने या फिर जनादेश के अपहरण की कोई बड़ी चेष्टा हो सकती है। हमारा देश ऐसी किसी दुर्घटना से बचा रहे, यही वर्ष 2023 की मंगलकामना हो सकती है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.