क़ुरआन की व्याख्या के बुनियादी सिद्धांत

———————————————————————-
✍ डॉ. मो. वासे ज़फ़र
क़ुरआन की आयतों (Verses) की व्याख्या (Interpretation) के विज्ञान को तफ़्सीर (Qur’anic Exegesis) कहा जाता है। अरबी शब्द ‘तफ़्सीरुन’ (تَفْسِيرٌ) की व्युत्पत्ति मूल शब्द ‘फ़सरुन’ (فَسْرٌ) से हुई है जिसका अर्थ है खोलना, स्पष्ट करना, व्याख्या करना या टीका टिप्पणी करना। चूंकि ज्ञान की इस शाखा में क़ुरआन की आयतों के अर्थों की व्याख्या की जाती है और उसके आदेशों और ज्ञानों को खुले तौर पर और स्पष्ट रूप से वर्णित किया जाता है, इसलिए इसे ‘इल्म-ए-तफ़्सीर’ (Science of Tafseer) कहा जाता है। क़ुरआन की आयतों की एक उचित व्याख्या मुसलमानों के लिए शुरुआती दौर से ही उनमें निहित मूल्यों, सिद्धांतों और आदेशों को समझने और लागू करने के लिए महत्वपूर्ण रही है। इसलिए, तफ़्सीर मुसलमानों की शुरुआती शैक्षणिक गतिविधियों में से एक है। क़ुरआन के अनुसार, मुहम्मद (ﷺ) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शुरुआती मुसलमानों के लिए क़ुरआनी आयतों के अर्थों का वर्णन किया था। पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) को संबोधित करते हुए, पवित्र क़ुरआन कहता है:
بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ ﴿16:44﴾
अर्थात, “पिछले रसूलों को भी हमने रौशन (स्पष्ट) निशानियाँ और किताबें देकर भेजा था और अब ये ‘ज़िक्र’(संदेश) तुम पर उतारा है, ताकि तुम लोगों के सामने उस तालीम को खोलकर साफ़-साफ़ बयान करते जाओ जो उनके लिये उतारी गई है और ताकि लोग (ख़ुद भी उन पर) सोच-विचार करें।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-नह्ल 16: 44]
पवित्र क़ुरआन यह भी कहता है:
لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِنْ أَنْفُسِهِمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آَيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُبِينٍ ﴿3:164﴾
“हक़ीक़त में ईमानवालों पर तो अल्लाह ने ये बहुत बड़ा एहसान (उपकार) किया है जब उसने उनके बीच ख़ुद उन्हीं में से एक ऐसा पैग़म्बर उठाया जो उसकी आयतें उन्हें सुनाता है, उनकी ज़िन्दगियों को सँवारता है और उनको किताब और हिकमत (बुद्धिमत्ता) की तालीम देता है, हालाँकि इस से पहले यही लोग खुली गुमराहियों में पड़े हुए थे।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह आलि इमरान 3:164]
ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि अल्लाह के हुक्मों के अनुसार, पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) ने न केवल क़ुरआन के शब्दों को पढ़ाया, बल्कि उन्होंने विस्तार से उनके अंतर्निहित अर्थों को भी लोगों को समझाया। पैग़म्बर साहब (ﷺ) के साथी (शिष्य) भी क़ुरआन की आयतों को उनके अर्थों एंव व्याख्याओं के साथ सीखने के लिए बहुत उत्सुक रहते थे। यही कारण है कि पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कुछ आदरणीय साथियों को क़ुरआन की एक सूरह “अल-बक़रह” (जो सबसे लंबी सूरह है) को सीखने में कई साल लग गए, इस तथ्य के बावजूद कि वे सभी अरबी जानने वाले लोग थे। पैग़म्बर (ﷺ) के निधन के बाद, यह आवश्यक हो गया कि क़ुरआन की तफ़्सीर को ज्ञान की एक स्थायी शाखा के रूप में संरक्षित किया जाए ताकि पवित्र क़ुरआन के शब्दों के साथ-साथ उनके सटीक अर्थों की भी रक्षा की जा सके और वो मुस्लिम उम्मह के लिए संरक्षित रहे, तथा विधर्मियों (Heretics بدعتیوں) एवं विचलनवादियों (Deviationists انحراف پسندوں) को उनके अर्थों के विरूपण और गलत व्याख्या के लिए कोई गुंजाइश नहीं मिल सके।
इसलिए, मुस्लिम ‘उलमा (Religious Scholars) ने इस मामले में बहुत अधिक पीड़ा उठाई और इस महान कार्य को इतनी प्रभावकारिता के साथ (Efficaciously) पूरा किया कि आज कोई भी शोधकर्ता (Researcher) बिना किसी संदेह या अस्वीकृति के डर के यह कह सकता है कि न केवल ईश्वर-अल्लाह की इस आख़िरी किताब के शब्द सुरक्षित हैं बल्कि उनकी सही तफ़ासीर (‘तफ़्सीर’ का बहुवचन) और व्याख्याएं जो पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) और उनके साथियों के माध्यम से हम तक पहुंची हैं, वह सब भी सुरक्षित एवं विश्वसनीय हैं। अहादीस (एकवचन: हदीस) की सभी संदर्भित पुस्तकों जैसे सही अल-बुख़ारी, सही मुस्लिम, सुनन अल-तिर्मिज़ी आदि में क़ुरआन की आयतों की तफ़्सीर पर अलग-अलग अध्याय हैं, जिनमें पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) और उनके शिष्यों के संबंधित कथन शामिल हैं, जिन्हें “किताब अल-तफ़्सीर” (کتاب التفسیر) कहा जाता है, जो मुस्लिम ‘उलमा की इस संबंध में की गई कोशिशों का सामान्य सबूत हैं। ‘उलमा ने ‘इल्म-ए-तफ़्सीर’ का किस प्रकार संरक्षण किया? इस मिशन में उन्हें किन चरम प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ा? इस महान प्रयास को कितने चरणों से गुज़रना पड़ा? इन सबका एक लंबा और दिलचस्प इतिहास है जिसे इस लेख में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है। वर्तमान लेख चूँकि क़ुरआन की आयतों की व्याख्या के सिद्धांतों पर आधारित है, और यहाँ इरादा संक्षेप में केवल यह लिखने का है कि क़ुरआन की व्याख्या के स्रोत क्या हैं और इन स्रोतों को उन सभी शोधकर्ताओं द्वारा जो पवित्र क़ुरआन से संबंधित किसी प्रकार के शोध-अध्ययन में व्यस्त हैं, उसकी व्याख्या करने में कैसे उपयोग में लाना चाहिए। क़ुरआन की आयतों की व्याख्या के मुख्य स्रोत जिनका किसी भी शोधकर्ता या टिप्पणीकार को ध्यान रखना चाहिए, इस प्रकार हैं:
1. क़ुरआन की व्याख्या क़ुरआन की रौशनी में
क़ुरआन की आयतों की व्याख्या का पहला स्रोत ख़ुद पवित्र क़ुरआन ही है अर्थात उसकी एक आयत किसी दूसरी आयत की व्याख्या कर रही होती है। इस पवित्र ग्रंथ में ऐसे कई उदाहरण हैं जिन में किसी एक बात या विषय का उल्लेख जो एक जगह बहुत संक्षिप्त है और जिसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता दिखती है, क़ुरआन की ही किसी अन्य आयत द्वारा उसे सुबोध रूप से स्पष्ट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, क़ुरआन की पहली सूरह, अल-फ़ातिहा की इन दो आयतों को देखें:
اِهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيْمَ ﴿1:6﴾ صِرَاطَ الَّذِيْنَ أَنعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوْبِ عَلَيْهِمْ وَلاَ الضَّالِّيْنَ ﴿1:7﴾
“हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग जिन पर तू ने अपनी कृपा की है, जो मातूब (प्रकोप और ग़ज़ब का शिकार) नहीं हुए, और जो पथभ्रष्ट (भटके हुए) नहीं हैं।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-फ़ातिहा 01: 6-7]
सूरह फ़ातिहा वास्तव में एक दुआ है जो अल्लाह ने अपने बन्दों को सिखाई है। यहाँ पर यह स्पष्ट नहीं है कि वे कौन लोग हैं जिन पर अल्लाह सर्वशक्तिमान ने इनाम किया है या उनपर अपनी कृपा की है। परन्तु दूसरे स्थान पर एक अन्य आयत में इनकी पहचान बड़ी स्पष्ट रूप से बताई गई है जहाँ यह कहा गया है:
وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ وَحَسُنَ أُولَئِكَ رَفِيقًا ﴿4:69﴾
“जो अल्लाह और रसूल की इताअत (आदेशों का पालन) करेगा वो (आख़िरत में) उन लोगों के साथ होगा जिनपर अल्लाह ने इनाम किया है, यानी नबी (Prophets) और सच्चे लोग और शहीद (Martyr) और सालिहीन (अच्छे लोग)। कैसे अच्छे हैं ये साथी जो किसी को मिलें!” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-निसा 4: 69]
इसी तरह सूरह अल-बक़रह में आदम (अ.) से संबंधित एक घटना के वर्णन में क़ुरआन कहता है;
فَتَلَقَّى آَدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ إِنَّهُ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ ﴿2:37﴾
“फिर आदम ने अपने रब से कुछ कलिमात (बोल) सीख कर तौबा की, जिसको उसके रब ने क़ुबूल कर लिया, क्योंकि वो बड़ा माफ़ करने वाला और अत्यन्त दयावान (रहम करने वाला) है।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-बक़रह 2: 37]
इस स्थान पर यह स्पष्ट नहीं है कि आदम (अ.) ने अपने रब (परवरदिगार) से कौन से शब्द सीखे थे लेकिन एक अन्य आयत में जो कि सूरह आ’राफ़ में है, उनका स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है जहाँ कहा गया है:
قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ ﴿7:23﴾
“दोनों बोल उठे, “ऐ रब ! हमने अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) किया। अब अगर तूने हमें माफ़ (क्षमा) न किया और रहम (दया) न किया तो यक़ीनी तौर पर (अर्थात, निश्चित रूप से) हम तबाह हो जाएँगे।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-आ’राफ़ 7: 23]
इसलिए, जब क़ुरआन के टिप्पणीकार (जिन्हें मुफ़स्सिर कहा जाता है) किसी आयत की व्याख्या करते हैं, तो वे पहले यह सुनिश्चित करते हैं कि क्या इस आयत की कोई तफ़्सीर (व्यख्या) पहले से ही पवित्र क़ुरआन में किसी और स्थान पर मौजूद है। यदि ऐसा है, तो वे उसे अपनी पहली पसंद के रूप में चुनते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है क्योंकि क़ुरआन हम इंसानों की लिखी किताबों की तरह नहीं है जिसमें एक विषय या मुद्दे से संबंधित सभी बातें एक स्थान पर, एक अध्याय में रखी जाती हैं, यह एक ईश्वरीय ग्रंथ है जो पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) पर लगभग 23 सालों में थोड़ा थोड़ा, परिस्थितियों के आलोक में अवतरित (नाज़िल) हुआ है और इस में एक ही विषय या मुद्दे से संबंधित बातें आपको कई स्थानों पर, अलग अलग सूरह में मिलेंगी। इसलिए कोई भी शोधकर्ता अगर किसी सामाजिक मुद्दे पर क़ुरआन के दृष्टिकोण की व्याख्या करना चाहता है तो उसे पूरे धैर्य के साथ क़ुरआन की उन सभी आयात (Verses) को देखना होगा जो उस मुद्दे से संबंधित है, तभी वह सही, संतुलित और विश्वशनीय निष्कर्ष तक पहुंच सकता है। जो लोग ऐसा नहीं करते और क़ुरआन की कहीं से किसी एक आयत को लेकर कोई राय बना लेते हैं, वे ख़ुद भी भ्रमित होते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते हैं। इसलिए एक शोधकर्ता को किसी विशेष आयत की व्याख्या से पहले उस से संबंधित पवित्र क़ुरआन की सभी आयतों (Verses) को ज़रूर देखना चाहिए।
2. क़ुरआन की व्याख्या अहादीस की रौशनी में
क़ुरआन की तफ़्सीर या व्याख्या का दूसरा स्रोत अहादीस (एकवचन, हदीस) अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) के शब्द, उनके व्यवहार, उनकी जीवनशैली और अपने शिष्यों को दिये गए उनके उपदेश हैं। जैसा कि पहले व्यक्त किया गया है, अल्लाह ने उन्हें क़ुरआन के साथ केवल लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा था और उनको यह ज़िम्मेदारी सौंपी थी कि क़ुरआन के पैग़ामात (संदेशों) को स्पष्ट रूप से लोगों तक पहुँचाएँ। क़ुरआन कई आयतों में उनके इस कर्तव्य को निर्दिष्ट करता है। जैसे;
إِنَّا أَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ بِمَا أَرَاكَ اللَّهُ وَلَا تَكُنْ لِلْخَائِنِينَ خَصِيمًا ﴿4:105﴾
“(ऐ नबी!) हमने ये किताब हक़ (सच्चाई) के साथ आपकी तरफ़ अवतरित की है, ताकि जो सीधा रास्ता अल्लाह ने आपको दिखाया है उसके मुताबिक़ लोगों के बीच फ़ैसला करें, और आप बददियानत (विश्वासघाती) लोगों की तरफ़ से झगड़नेवाले न बनें।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-निसा 4: 105]
एक जगह क़ुरआन यह कहता है जिसे ऊपर भी लिखा जा चुका है;
وَ اَنۡزَلۡنَاۤ اِلَیۡکَ الذِّکۡرَ لِتُبَیِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ اِلَیۡہِمۡ وَ لَعَلَّہُمۡ یَتَفَکَّرُوۡنَ ﴿۴۴﴾
“और ये ‘ज़िक्र’ (क़ुरआन) आप पर इसी लिये उतारा है, ताकि आप लोगों के सामने उन बातों को खोलकर साफ़-साफ़ बयान कर दें जो उनके लिये उतारी गई हैं और ताकि लोग (ख़ुद भी) सोच-विचार करें।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-नह्ल 16: 64]
एक और स्थान पर क़ुरआन कहता है;
وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي اخْتَلَفُوا فِيهِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿16:64﴾
“हमने ये किताब आप पर इस लिये अवतरित की है ताकि आप उन इख़्तिलाफ़ात (मतभेदों) की हक़ीक़त (वास्तविकता) इन पर स्पष्ट कर दें जिनमें ये पड़े हुए हैं। ये किताब हिदायत (अनुदेश) और रहमत बनकर उतरी है उन लोगों के लिये जो इसे मान लें।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-नह्ल 16: 64]
उपरोक्त आयतों से यह स्पष्ट है कि पैग़म्बर (ﷺ) की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानवता को क़ुरआन के आदेशों की व्याख्या करके उनका मार्गदर्शन करना था। तदनुसार, उन्होंने अपने शब्दों और कर्मों दोनों के द्वारा इस दायित्व को बहुत ही सुंदरता और उत्कृष्टता के साथ निभाया। हक़ीक़त (वास्तव) में उनका संपूर्ण पवित्र जीवन, क़ुरआन की एक व्यावहारिक तफ़्सीर है। यही कारण है कि सम्मानित टीकाकारों (मुफ़स्सिरों) ने क़ुरआन को समझने के लिए हदीस को दूसरे स्रोत के रूप में मान्यता दी है जो कि वास्तव में क़ुरआन ने ही स्थापित किया है, और हदीस के प्रकाश में ही उन्होंने पवित्र पुस्तक के अर्थ निर्धारित किए हैं। फिर भी, चूंकि सभी प्रकार की रिवायतें (Narrations); प्रामाणिक (Authentic صحیح), कमज़ोर (Weak ضعیف) और मनगढ़ंत (Fabricated موضوع), अहादीस के ज़खीरे (संग्रह या कोष) में शामिल हैं, इसलिए शोध-उन्मुख टिप्पणीकार किसी रिवायत (कथन) को विश्वसनीय (Reliable) और भरोसेमंद नहीं मानते हैं जब तक कि वह रिवायत, हदीस की जांच में उपयोग किए गए मुहद्दिसीन (Experts on Hadees) के सिद्धांतों पर पूरी नहीं उतरती। इसलिए, कहीं से भी किसी एक हदीस को लेकर उसका उपयोग किसी विशेष आयत की एक निश्चित तफ़्सीर या व्यख्या के लिए करना सही नहीं है, क्योंकि वह रिवायत संभवतः कमजोर (ضعيف) हो सकती है, यहाँ तक कि किसी अन्य प्रामाणिक (مستند) रिवायतों के विपरीत (ख़िलाफ़) भी हो सकती है। वास्तव में यह एक बहुत ही नाज़ुक मामला (Delicate Affair) है, और इसमें शामिल होना उन लोगों का ही विशेष अधिकार है, जिन्होंने ज्ञान के इस क्षेत्र में महारत (Expertise) हासिल कर ली हो।
इसलिए, एक विशेष आयत में निहित संदेश को समझने एवं उसकी व्याख्या के लिए एक शोधकर्ता को प्रामाणिक एवं प्रासंगिक हदीस की खोज ज़रूर करनी चाहिए।
3. सहाबा के अक़्वाल (कथनों) के आलोक में व्याख्या
सहाबा, पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) के श्रद्धेय साथियों एवं शिष्यों को कहा जाता है जिन्होंने उन पर ईमान लाया और अपने अंतिम समय तक उस पर क़ायम रहे। यह वह भाग्यशाली गिरोह है जिस ने अपनी धार्मिक शिक्षा सीधे तरीक़े से पवित्र पैग़म्बर (ﷺ) से प्राप्त की थी। इसके अलावा, वे व्यक्तिगत रूप से बहुत से ऐसे मौक़ों पर मौजूद भी थे जब ईश्वरीय संदेश (वही وحی) के माध्यम से क़ुरआन का अवतरण हुआ, और उन्होंने ख़ुद क़ुरआन के अवतरण की स्थितियों एवं परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। इसलिए, स्वाभाविक रूप से, उनके रिकॉर्ड किए गए बयान (जिन्हें ‘आसार’ कहा जाता है) को बाद के समय के लोगों की तुलना में क़ुरआन की आयतों को समझने और व्याख्या करने में अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए, किसी विशेष आयत के मामले में, जिसकी व्याख्या क़ुरआन या सही अहादीस में नहीं मिलती है, सहाबा (رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ) के दर्ज बयानों को अत्यधिक प्राथमिकता दी जाती है। उनमें से अबू-बकर (र.अ.), ‘उमर (र.अ.), ‘उसमान (र.अ.), ‘अली (र.अ.), अब्दुल्लाह इब्ने मस’ऊद (र.अ.), अब्दुल्लाह इब्ने ‘अब्बास (र.अ.), उबैय इब्ने का’ब (र.अ.), ज़ैद इब्ने साबित (र.अ.), अबू मूसा अल-अश’अरी (र.अ.), ‘अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर (र.अ.) के कथनों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि वे तफ़्सीर के क्षेत्र में अपने ज्ञान एवं योगदान लिए अच्छी तरह से जाने जाते हैं और अगर किसी आयत की व्याख्या पर सहाबा की आम सहमति हो तो टीकाकार उसी व्याख्या को अपनाते हैं, और उसके अलावा किसी और तरीके से उस आयत की व्याख्या करना स्वीकार्य नहीं माना जाता। सहाबा (र.अ.) के कथन यदि किसी विशेष आयत की व्याख्या (तफ़सीर) में भिन्न हैं, तो बाद में आने वाले टीकाकार उन्हें तर्कों (Arguments دلائل) की प्रभावकारिता (Effectiveness) के आलोक में आंकते हैं और यह पता लगाते हैं कि किस व्याख्या को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसके अलावा, पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) के श्रद्धेय साथियों के बयानों से संदर्भ (Reference) लेने के लिए, उसूल-ए-हदीस (Foundations of Prophetic Traditions) और उसूल-ए-तफ़्सीर (Principles of Exegesis) के विज्ञान के तहत पहले से ही संहिताबद्ध नियमों के एक महत्वपूर्ण कोष के आधार पर उनकी प्रामाणिकता भी सुनिश्चित की जाती है।
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि सहाबा क़ुरआन की आयतों के अवतरण (नुज़ूल) की परिस्थितियों से बहुत अच्छी तरह अवगत थे, जिन्हें ‘असबाबुन नुज़ूल’ (الاسباب النزول) कहा जाता है, इस लिये इस संबंध में उनके विचारों को विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि किसी आयत का अर्थ बेहतर तौर पर समझा जा सकता है अगर हम जानते हों कि यह कैसे, किन परिस्थितियों में और कब अवतरित (नाज़िल) हुई थी। इसके अलावा ‘असबाबुन नुज़ूल’ हमें आयात के सामान्य संदर्भ में अनुप्रयोग एवं कानूनी फ़ैसलों के पीछे निहित कारणों को भी समझने में सहायक होते हैं। ये हमें विशिष्ट या सामान्य अर्थ के साथ किसी आयत के अवतरण (नुज़ूल) के उद्देश्य को समझने में भी मदद करते हैं, और पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) के नेतृत्व में शुरुआती मुस्लिम समाज में हुई विभिन्न प्रकार की गतिविधियों का भी एक अच्छा लेखा-जोखा प्रदान करते हैं। कभी-कभी किसी आयत का सही अर्थ अनिवार्यतः तभी समझा जासकता है जब हम उन परिस्थितियों को जानते हों जिनमें वह आयत अवतरित हुई थी। आधुनिक विचारक इस दृष्टिकोण को क़ुरआन की व्याख्या का समाजशास्त्रीय (Sociological) या सामाजिक-ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Socio-historical approach) कहते हैं। उनका विचार है कि क़ुरआन के विशिष्ट सामाजिक आदेशों को उनके अवतरण के सामाजिक-इतिहास के संदर्भ में और सामान्य इस्लामी पद्धति से ज़रा अलग हट कर समझा जाना चाहिए। इन अवयवों से, सामान्य नियम या निर्देश निकाले जाने चाहिए जो इस्लामी भावना के साथ पूर्ण सहमति रखते हों ताकि उन्हें अलग-अलग समय में समाज में लागू किया जा सके।
इसलिए, एक शोधकर्ता को क़ुरआन और अहादीस को देखने के बाद एक विशेष आयत में निहित संदेशों की व्याख्या के लिए पैग़म्बर (ﷺ) के साथियों एवं शिष्यों के प्रामाणिक और प्रासंगिक कथनों की खोज करनी चाहिए।
4. ताबईन के कथनों के आलोक में क़ुरआन की आयतों की व्याख्या
सहाबा के उत्तराधिकारियों को ताबईन (एक वचन: ताबई) कहा जाता है। उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद (ﷺ) के साथियों एवं शिष्यों (र.अ.) से क़ुरआन की तफ़्सीर सीखी। इसलिए तफ़्सीर के विज्ञान में उनके बयानों का भी बहुत महत्व है। हालाँकि, विद्वानों के बीच इस बात पर मतभेद है कि ताबईन के कथन तफ़्सीर में निर्णायक हैं या नहीं, लेकिन उनका महत्व कुछ ऐसा है जिसे नकारा नहीं जा सकता। क़ुरआन के विख्यात टीकाकार, अल्लामा इब्ने-कसीर (c. 1300 – 1373 ई.) ने इस संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार, यदि कोई ताबई केवल पैग़म्बर साहब (ﷺ) के किसी साथी से रिवायत (रिपोर्टिंग) कर रहा हो, तो उसके बयान को सहाबा (र.अ.) की टिप्पणी माना जाएगा, लेकिन यदि वह किसी विशेष आयत के संबंध में अपना बयान देता है, तो देखा जाएगा कि उसका बयान किसी दूसरे ताबई के बयान के ख़िलाफ़ तो नहीं है, और अगर ऐसा है तो उसका बयान क़ुबूल नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में आयत की तफ़्सीर, क़ुरआन, हदीस, आसार-ए-सहाबा, लुग़त-ए-अरब (अरबों की भाषाई प्राथमिकता या शब्दकोश) और अन्य शर’ई उसूलों (धार्मिक सिद्धांतों) के आधार पर की जाएगी। तथापि, अगर किसी विशेष आयत की व्याख्या पर ताबईन के दरमियान (बीच) सहमति है, तो उनकी व्याख्या निर्विवाद रूप से स्वीकार की जाएगी। ताब’ईन के तबक़े (कैडर) में मुजाहिद, ‘अता बिन अबी रूबाह, ‘इकरमह, सईद इब्ने ज़ुबैर, हसन बसरी, अबुल ‘आलियह, ज़हाक और क़तादह के विचारों को उनकी विद्वता और तफ़्सीर के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण उचित महत्व दिया जाता है।
5. तफ़्सीर में लुग़त-ए-अरब (अरबों की भाषाई प्राथमिकता या शब्दकोश) एवं अरबी भाषाविज्ञान का लिहाज़
जैसा कि मालूम है कि पवित्र क़ुरआन अरबी भाषा में अवतरित हुआ था, अतः उसकी आयतों के अर्थ की व्याख्या के लिए अरबी भाषा पर पूरी तरह से महारत हासिल करना अनिवार्य है। क़ुरआन की बहुत सी आयतें ऐसी हैं जिनके अवतरण की पृष्ठभूमि में कोई तात्कालिक कारण (सबब-ए-नुज़ूल سَبَبِ نُزُول), या किसी न्यायिक या विद्वतापूर्ण प्रश्न की कोई उपस्थिति नहीं होती है। इसलिए उनकी व्याख्या में पवित्र पैग़म्बर (ﷺ) के कथन, या सहाबा और ताबईन के कथनों की रिवायत (रिपोर्ट) नहीं मिलती है। इसे देखते हुए, इस प्रकार की आयतों की व्याख्या करने का एकमात्र साधन अरबी भाषा है और उसमें शामिल शब्दों या वाक्यों के भाषाई विश्लेषण (Linguistic Analysis) के आधार पर ही उनके अर्थों को स्पष्ट किया जाता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी आयत की तफ़्सीर में कुछ मतभेद हो तो उस स्थिति में भी भाषाविज्ञान (Linguistics) का प्रयोग परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच प्रामाणिकता की जाँच करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में लुग़त-ए-अरब (अरबों की भाषाई प्राथमिकता या शब्दकोश) पर विशेष ध्यान दिया जाता है, विशेष रूप से लुग़त-ए-क़ुरैश (क़ुरैश की भाषाई प्राथमिकता) पर, क्योंकि यह वह जनजाति है जिसमें पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.व.) का जन्म हुआ था, और क़ुरआन उनकी शब्दावली (Vocabulary) या मुहावरे में अवतरित हुआ था।
अरबी भाषा के भाषाशास्त्र का ज्ञान क़ुरआन की आयतों के उपयुक्त अर्थों को समझने में इतना महत्वपूर्ण है कि मुजाहिद (र.अ.), जो ताबईन वर्ग के एक प्रामाणिक टिप्पणीकार हैं, कहते हैं; “जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है, उसे क़ुरआन के बारे में अपने होंठ तब तक नहीं खोलने चाहिए, जब तक कि वह अरबी भाषा के भाषाशास्त्र से पूरी तरह अवगत न हो। अक्सर एक अरबी शब्द के कई अर्थ होते हैं। ऐसा हो सकता है कि एक व्यक्ति उनमें से केवल एक या दो को ही जानता हो, हालांकि किसी दिए गए संदर्भ में वास्तविक अर्थ उनसे काफी भिन्न हो।”
अरबी लुग़त (علم فقه اللغة, Philology) पर महारत के अलावा, अन्य भाषाई विज्ञानों जैसे सर्फ़ (صرف, Etymology), नह्व (النحو, Syntax), इश्तिक़ाक़ (استقاق, Knowledge of Derivatives), ‘इल्मुल-म’आनी (علم المعانی, Knowledge of Semantics), ‘इल्मुल-बयान (علم البیان, Knowledge of figures of speech like Similes and Metaphors), ‘इल्मुल-बदी’ (علم البدیع, Knowledge of Rhetoric) और ‘इल्मुल-क़िराअत’ (علم القرأة, उच्चारण की कला का ज्ञान) भी तफ़्सीर के लिए आवश्यक माना जाता है।
इसलिए, एक शोधकर्ता को अरबी भाषा से अच्छी तरह वाक़िफ़ (परिचित) होना चाहिए, विशेष रूप से उस अवधि के अरबी साहित्य से जिसमें क़ुरआन का अवतरण हुआ था ताकि किसी विशेष आयत की व्याख्या में वह इस बात पर विचार कर सके कि उस वक़्त के अरबों (Arabs) की सामान्य बातचीत में एक विशेष शब्द का उपयोग कैसे किया गया है और उनके साहित्यिक कार्यों में कैसे किया गया है।
6. तदब्बुर व तफ़क्कुर (चिंतन व मनन) के आधार पर क़ुरआन की व्यख्या
क़ुरआन की आयतों की व्याख्या में तदब्बुर व तफ़क्कुर (चिंतन व मनन) और अक़्ल-ए-सलीम (Common Sense) का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान हुआ करता है। कुरआन ख़ुद इंसानों को अपने मन में मौजूद शंकाओं को दूर करने और आध्यात्मिक जीवन का सच्चा पाठ सीखने के लिए अपनी आयतों पर चिंतन व मनन करने का सुझाव देता है। क़ुरआन कहता है;
كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِيَدَّبَّرُوا آَيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُواْ الْأَلْبَابِ ﴿38:29﴾
“ये एक बड़ी बरकत वाली किताब है जो (ऐ नबी ﷺ) हमने आप पर (इसलिए) उतारी है, ताकि ये लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें और अक़्ल और समझ रखने वाले इससे नसीहत (सबक़) हासिल करें।” [पवित्र क़ुरआन, सूरह साद 38: 29]
यह आयत प्रतिबिंबित करती है कि क़ुरआन के अवतरण (नुज़ूल) का बड़ा उद्देश्य नसीहत प्राप्त करने के लिए इसकी आयतों पर चिंतन व मनन (ग़ौर व फ़िक्र) करना है। इससे यह भी पता चलता है कि केवल बुद्धिमान (अक़्लमंद एवं समझदार) लोग ही इसके निर्देशों से लाभ उठा सकते हैं। एक अन्य स्थान पर क़ुरआन उन लोगों की भर्त्सना करता है जो इस में चिंतन व मनन (ग़ौर व फ़िक्र) नहीं करते। इसके शब्द हैं;
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآَنَ أَمْ عَلَى قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا ﴿47:24﴾
“तो क्या यह लोग क़ुरआन में ग़ौर व फ़िक्र (चिंतन व मनन) नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं?” [पवित्र क़ुरआन, सूरह मुहम्मद 47: 24]
एक और स्थान पर क़ुरआन यह कहता है;
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآَنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِنْ مُدَّكِرٍ ﴿54:17﴾
“और बेशक हमने इस क़ुरआन को नसीहत (सदुपदेश, सीख) हासिल करने के लिये आसान बना दिया है, फिर क्या कोई है नसीहत क़ुबूल करने वाला?” [पवित्र क़ुरआन, सूरह अल-क़मर 54: 17]
इन आयतों से स्पष्टतया पता चलता है कि क़ुरआन अपने विषय वस्तु पर चिंतन और विचार करने पर कितना ज़ोर (बल) देता है। चूंकि ये आयात सामान्य प्रकृति की हैं, अतः ये संपूर्ण मानव जाति के लिए क़ुरआन में चिंतन एवं मनन के अधिकार को सार्वभौमिक बनाती हैं जिसका दरवाज़ा (द्वार) क़ियामत तक खुला हुआ है।
वास्तव में क़ुरआन के असरार व म’आरिफ़ (रहस्य और ज्ञान) समुद्र की तरह हैं जिसका न कोई किनारा है और न ही कोई अंत। इसलिए, एक व्यक्ति, जिसे अल्लाह ने अक़्ल-ए-सलीम (Good Sense) और इस्लामी विज्ञानों में अंतर्दृष्टि प्रदान की है, जितना अधिक क़ुरआन में मंथन करता है, उतना ही वह नए-नए तथ्यों, ज्ञान की सूक्ष्मताओं (बारीकियों) और उनके निहितार्थों (Implications) को उजागर करता है। इसीलिए क़ुरआन के टीकाकार किसी आयत की व्याख्या में अपने ग़ौर व फ़िक्र (चिंतन व मनन) के नतीजे (Outcomes) एवं निष्कर्षों (Conclusions) को भी प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इस प्रकार वर्णित तथ्य या व्याख्या और उनके निहितार्थ तभी स्वीकार्य माने जाते हैं, जब वे ऊपर बताए गए पाँच श्रोतों के विरुद्ध न जाएँ। इसलिए यदि कोई व्यक्ति क़ुरआन की व्याख्या करते समय किसी नए बिंदु को उजागर करता है या एक स्वतंत्र राय या नज़रिया (दृष्टिकोण) क़ाइम (स्थापित) करता है जो क़ुरआन, पैग़म्बर (ﷺ) की सुन्नत, इज्मा (आम सहमति), अरबी लुग़त, या सहाबा और ताबईन के बयानों के ख़िलाफ़ (विपरीत) हो, या इस्लामी शरी’अत (Jurisprudence) के अन्य स्थापित सिद्धांतों के विरोध में हो, तो उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं होगी और अंततः कोई स्वीकृति भी नहीं मिलेगी।
इसलिए, एक शोधकर्ता को क़ुरआन की किसी आयत की स्वतंत्र व्याख्या करते समय उपरोक्त पांच स्रोतों का खंडन या विरोध नहीं करना चाहिए ताकि उसके निष्कर्षों की वैधता एंव विश्वसनीयता निर्विवाद बनी रहे।
*******
(ईमेल: [email protected])

Leave A Reply

Your email address will not be published.