नए जमाने में सिर्फ शिक्षक और छात्र का कानूनी रिश्ता बाक़ी रह गया है

अब्दुल गफ़र सिद्दीक़ी

अध्यक्ष रशीदा एजुकेशनल एंड सोशल ट्रस्ट

9897565066

एक समय था जब एक बच्चे को स्कूल में प्रवेश कराते समय उसके पिता या अभिभावक बच्चे के शिक्षक से कहते थे  “मास्टरजी बच्चा आप का है, आप के हवाले है, अब इस की हड्ड़ी मेरी मांस आप का है।” यह वह समय था जब स्कूल की इमारतें भव्य नहीं थीं, निजी स्कूल भी नहीं थे, केवल सरकारी स्कूल थे। वे भी हर गाँव में नहीं होते थे, कुछ बच्चों को नदी पार ‘ पढ़ने के लिए जाना पड़ता था। उन्हें बैठने के लिए बोरी या प्लास्टिक का थैला ले जाना पड़ता था। जब बारिश होती थी, तो स्कूल तालाब बन जाता था। हालांकि यूपी और बिहार के सरकारी प्राइमरी स्कूलों में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है । अब शायद सरकार की ओर से बैठने की व्यवस्था की गई है । अब स्कूल से किताबें मिल जाती हैं । यह अलग है कि  किताबें  सत्र  समाप्त होते होते आती  हैं। यूनिफॉर्म भी स्कूल की ओर से उपलब्ध कराया जाता है और मिड डे मील के नाम पर दलिया, खिचड़ी परोसी जा रही है। पहले के समय में, सभी सरकारी काम प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों द्वारा किया जाता था और इस आधुनिक युग में भी मैं वही देखरहा हूं। हालांकि 40-45 साल पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी, अब सिर्फ पढ़ाई का नाम और निशान रह गया है।

शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव शिक्षक और छात्र के रिश्ते में आया है । पुराने जमाने में शिक्षक में पिता का प्यार पाया जाता था । एक पिता के प्यार और एक शिक्षक के प्यार के बीच कोई अंतर महसूस नहीं किया जा सकता था। बल्कि, कुछ शिक्षक पिता की तुलना में अधिक प्रेम करते थे। ग़ैर महसूस तरीक़े  से छात्र अपने शिक्षक के क़रीब होता जाता था । गुरु की उपस्थिति में शिष्य को लगता था कि उसके सिर पर छत्र छाया है। आधुनिक समय में,या यूं कहिये कि 21वीं सदी की शुरुआत के बाद से, यह संबंध केवल व्यावसायिक और कानूनी बन कर रह गया है।

एक ओर शिक्षा को धंधा बना दिया गया है । निजी स्कूलों ने इसे आर्थिक समृद्धि का जरिया बना लिया है । उनके सामने हमेशा पैसा रहता है। किसी न किसी बहाने फीस वसूल की जा रही है। पाठ्यक्रम में महंगी पुस्तकें शामिल हैं। फिर हर साल पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाता है ताकि कमीशन के नाम पर पैसा कमाया जा सके। कुछ स्कूल हर साल प्रवेश शुल्क लेते हैं ।  इसके बाद भी बच्चों को ट्यूशन लेनी पड़ती है । आजकल ट्यूशन और कोचिंग भी एक पेशा बन गया है । कोचिंग के नाम पर लाखों रुपये लिए जाते हैं और करोड़ों का मुनाफा होता है। अमीर लोग स्कूल ऐसे खोल रहे हैं जैसे वे कोई कंपनी या फैक्ट्री खोल रहे हों । स्कूलों के इस रवैये ने माता-पिता और जनता को भी व्यावसायिक बना दिया है। वह यह देखने के बजाय कि शिक्षा कहाँ अच्छी है,  पाठ्यक्रम कैसा है, पर्यावरण क्या है? किस स्कूल में  तरबियत अच्छी है?  यह देखते हैं कि कम फीस पर कहां ज्यादा सुविधाएं हैं ?

“तरबियत ” शब्द ने मुझे याद दिलाया कि नए युग में यह शब्द स्कूल शब्दकोश से हटा दिया गया है। अब, न तो स्कूल प्रबंधन, न शिक्षक, न ही अभिभावक “तरबियत ” के बारे में सोचते हैं। पुराने दिनों में, स्कूल  “शिक्षा और दीक्षा ” के केंद्र थे आज के समय में वे केवल “शिक्षा का केंद्र” बन गए हैं। पहले “तरबियत ” शब्द को अनिवार्य कहा जाता था, हिंदी में भी “शिक्षा  के साथ दीक्षा” शब्द का प्रयोग किया जाता था। अब “तरबियत ” का शब्द  सुनने के लिए कान तरसते हैं। मुझे याद है कि हम अपने शिक्षक से आगे नहीं चलते थे। अगर हमने आहट भी सुनली कि शिक्षक आ रहा है, तो हम एक तरफ खड़े होजाते थे , जब शिक्षक आगे निकल जाते , तो हम उनके पीछे चलते थे। इस मामले में अभी मदरसों की स्थिति थोड़ी बहतर  है।

एक समय था जब छात्र अपने शिक्षकों से डरते थे। उन्हें पीटे जाने का खतरा था। अब यह डर खत्म हो गया है। अब बच्चों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर पीटना मना है। केवल शिक्षक ही नहीं माता पिता भी अपने बच्चों को सजा नहीं दे सकते। अगर बच्चे ने शिकायत की तो माता-पिता को जेल जाना होगा। बच्चों के अधिकारों के तथाकथित रक्षकों का कहना है कि मारना-पीटना बच्चों में हीनता की भावना पैदा करता है, उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है, कक्षा के सामने अपमानित होने से उनका प्रदर्शन प्रभावित होता है। उन्हें अपराधी मानकर सज़ा देना भविष्य में अपराधी बना सकता  है।  खैर, अल्लाह ही जानता है कि इन तथाकथित हमदर्दों ने इस तरह के कानून से पूरी शिक्षा व्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचाया है। यद्यपि उन दिनों मारपीट को अनुकूल दृष्टि से नहीं देखा जाता था, शिक्षक तंग आकर ही बेंत उठाते थे। फिर भी छात्र डंडों से डरते थे, आज बच्चे इस भय से मुक्त हैं। उस समय माता-पिता और अभिभावक अपने बच्चों को अपने सामने पिटते हुए देखते थे। लेकिन कभी टीचर को अपशब्द नहीं बोलते थे। कुछ लोग शिकायत लेकर पहुंचे थे। लेकिन वह यह भी कहते थे , “गुरु जी , मैं मारने से मना नहीं कर रहा हूं, लेकिन ज़रा देख भाल कर मारो “। ऐसा भी तब होता जब बच्चे के शरीर से खून निकल जाता  था ।  इसके बावजूद बच्चा अपने परिवार को नहीं बताता था, लेकिन उसके साथी घर पर इसकी सूचना देते थे। यह मेरा अनुभव है (मैं  ग्यारह साल एक उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक रहा हूँ ) कि शिक्षक की मार बच्चों को कुंदन बनाती है। हालांकि, इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि बच्चे को कोई शारीरिक नुकसान न हो। कुछ शिक्षक कान पर इतनी जोर से मार देते हैं कि बच्चा बहरा हो जाता है । कोशिश होनी चाहिए कि पिटाई की कोई ज़रूरत ही न हो, मौजूदा कानूनों का सम्मान करना भी जरूरी है।

इस रिश्ते में एक और बदलाव आया है वह शिक्षक की सेवा से संबंधित है। 20वीं सदी में शिक्षकों की अच्छी सेवा की जाती थी। 21वीं सदी में इसकी अवधारणा गायब हो गई है। शिक्षक के घर का काम होता था, गर्मी होने पर पंखा झला जाता था । कुछ शिक्षक सिर की मालिश भी कराते थे। मदरसों में शिक्षक के कपड़े भी धोए जाते थे। सेवा का यह कार्य केवल उस सीमा तक मान्य होना चाहिए जहाँ तक बच्चा इसे वहन कर सकता है या यह उसके दायरे में है। लेकिन उसके आगे यह उचित नहीं । पीने का पानी बच्चे लाकर दे सकते हैं  बड़े छात्रों से छुट्टी के बाद बाजार से सामान मँगवा सकते  हैं । लेकिन पैर दबवाना , मालिश कराना , या कपड़े धोने के लिए मजबूर करना उपयुक्त नहीं है। बच्चों में सेवा की भावना का विकास करना अच्छा है लेकिन उन्हें यह सेवा ख़ुशी से करनी चाहिए और यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि इस सेवा से उनकी शिक्षा प्रभावित नहीं होगी। यह भी ध्यान रखें कि सेवा की यह भावना शिक्षक की करुणा की भावना पर निर्भर करती है। हमारे एक शिक्षक थे , वह बहुत मारते थे ,अगर बच्चे को ज़ियादा चोट लग जाती तो  अपने हाथ से मरहम लगाते और उसे समझाते थे, समझाने का यह तरीका अक्सर शिक्षक और छात्र दोनों को रुला देता था।

शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक और छात्र के बीच बदलते रिश्ते देश को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब देश का भविष्य डिग्रियां तो प्राप्त कर रहा है। लेकिन उसके पास कोई नैतिकता नहीं है। किसी भी सेक्टर में जाएं, ऐसा लगता है कि यहां रोबोट काम कर रहे हैं, इंसान नहीं। सड़क पर दुर्घटना हो जाती है।  दुर्घटना पीड़ित मदद के लिए चिल्लाता है। लेकिन लोग गुजर जाते हैं। बड़े शहरों में इतना तो हो गया है कि पुलिस या एंबुलेंस को फ़ोने कर दिया जाता है।  इंसानियत के लिए किसी में दया नहीं है। हर कोई किसी और की जेब काटना चाहता है। बिना तरबियत के शिक्षा ने मानव समाज को असुरक्षित बना दिया है। समाज की चिंता करने वालों को शिक्षक और छात्र के बीच के संबंधों पर पुनर्विचार करना चाहिए। शिक्षकों को समझना चाहिए कि उनका पेशा कोई मामूली काम नहीं है। इस काम के लिए अल्लाह नबी भेजता था।

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