“दिल्ली दंगों से पहले जानबूझकर नफरत का माहौल बनाया गया। मीडिया ने आग को और भड़काने का काम किया। पुलिस ने नाजायज़ तरीके से UAPA का इस्तेमाल किया।”

पांच पूर्व न्यायाधीशों ने दिल्ली दंगों पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इस कमेटी के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर हैं।

रिपोर्ट कहती है, दिल्ली दंगे में दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय, सरकार और नफ़रती मीडिया की प्रमुख भूमिका रही। दंगे भड़कने से पहले नफ़रती माहौल बनाया गया। इसके लिए मीडिया का इस्तेमाल हुआ। दंगे के बाद सही तरीक़े से जांच नहीं की गई। कुछ लोगों को जेल में डालने के लिए ग़लत धाराओं का इस्तेमाल किया गया।

समिति ने कहा है कि नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध 2019 से ही किया जा रहा था। मुस्लिम अपनी नागरिकता छिन जाने के डर से विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इसी बीच विधानसभा चुनाव ने जोर पकड़ा और जानबूझकर नफ़रती बयान दिए गए। अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा जैसे नेताओं ने सार्वजनिक मंचों से मुसलमानों को गद्दार कहना शुरू किया।

आपको याद होगा कि हेट स्पीच देने वालों के लिए सरकार संरक्षक बनकर खड़ी रही। उनपर कार्रवाई का आदेश देने वाले जज का रातोंरात तबादला कर दिया गया था। “गोली मारो…’ वाला नारा लगाने वालों को सम्मान मिला।

यही है गुजरात मॉडल। देश की सरकार, देश की संस्थाएं और मीडिया उर्फ चौथा खंभा मिलकर देश के खिलाफ षडयंत्र करते हैं और आपको राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाते हैं। उस दंगे में मुसलमान भी मारे गए और हिंदू भी। उससे ​​मुसलमानों का भला हुआ या हिंदुओं का?

देश को अब समझ जाना चाहिए कि ‘खून में व्यापार’ लेकर घूम रहे नफरत के सौदागर न मुसलमान विरोधी हैं, न हिंदुओं के हितैषी। वे सत्तापिपासु लोग हैं जो अपनी कुर्सी के लिए कुछ भी कर डालेंगे।

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