कभी बड़ी-बड़ी मिलों वाले बिहार में समय के साथ क्यों बर्बाद होते गए उद्योग

 

राहुल कुमार गौरव

‘आज से 40-42 साल पहले शायद दो से तीन रुपये मजदूरी मिलती थी. गांव में नया-नया बनकर तैयार हुआ था पेपर मिल. गांव के मजदूर लोग खुश थे कि नौकरी मिलेगी. सरकार झूठा सपना दिखाकर हम लोगन को बर्बाद कर दिया. फिर हम लोग खेती करने लगे, अब बेटा लोग दिल्ली कमा रहा है.’ सहरसा के बैजनाथपुर गांव के 62 वर्षीय अशर्फी यादव बताते हैं.

 

स्थानीय पत्रकार विष्णु स्वरूप के मुताबिक 1974 ईस्वी में सहरसा के बैजनाथपुर गांव में पेपर मिल के लिए लगभग 50 एकड़ जमीन और 95 लाख रुपये का आवंटन हुआ था. प्रत्येक दिन 5 टन कागज के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था. 1982-83 के लगभग काम भी शुरू हुआ. फिर 1987 में पैसों के अभाव में काम रुक गया. पहले इस 50 एकड़ जमीन पर गरीब किसान बटैयादारी पर खेती करते थे. इस मिल के बनने से उनकी खेती भी खत्म हो गई और उन्हें नौकरी भी नहीं मिली.

वहीं सहरसा के कई लोग पेपर मिल न चलने के लिए सहरसा के दो बड़े स्थानीय नेताओं रमेश झा और टेकड़ीवाल की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता को जिम्मेदार ठहराते हैं. स्थानीय पत्रकार विमलेंदु सिंह के मुताबिक कांग्रेस सरकार में तत्कालीन उद्योग मंत्री रमेश झा के कार्यकाल में पेपर मिल की स्थापना हुई थी. लेकिन उनके बाद जब सहरसा के शंकर लाल टेकड़ीवाल वित्त मंत्री बने तो बताया जाता है कि रमेश झा से विरोध के कारण उन्होंने पेपर मिल पर ध्यान नहीं दिया. ऐसे में पेपर मिल बंद हो गई. बैजनाथपुर गांव के 14 वार्डों के अधिकांश लोग कृषि कार्य और मजदूरी पर निर्भर हैं. आज भी चुनाव के समय बैजनाथपुर पेपर मिल प्रमुख चुनावी मुद्दे में से एक है.

 

बैजनाथपुर पेपर मिल की तरह ही बिहार के चीनी मिल, जूट मिल सहित कई फैक्ट्रियों का एक सुनहरा अतीत था लेकिन उसका वर्तमान आज अंधेरे में डूबा हुआ है.

“जॉर्ज फर्नांडीज़ के नेतृत्व में जब मुजफ्फरपुर के बेला इंडस्ट्रियल बेल्ट में छोटे उद्योग लगने शुरू हुए तो वहां पर बनियान बनाने वाली एक स्थानीय फैक्टरी शुरू हुई. लेकिन बस दो-चार साल में ही सब ढह गया. फतुहा में विजय सुपर स्कूटर बनता था. बिहार की राजधानी पटना से 80 किलोमीटर दूर मढ़ौरा में ‘मॉर्टन’ चॉकलेट की कंपनी थीं. जो कि 1929 में स्थापित हुई थी और 1997 तक यह बंद हो गई. वहीं रोहतास जिले का डालमिया नगर 90 से पहले शक्कर, कागज, वनस्पति तेल, सीमेंट, रसायन और एस्बेसटस उद्योग के लिए विख्यात था. बिहार मे मॉर्टन चॉकलेट, डालमियां बिस्किट, HMT के ट्रैक्टर, कागज, जूट, खाद वगैरह बहुत सारे कारखाने थे. लेकिन अब जब कहा जा रहा है कि हम विकास कर रहे हैं तो सारे कारखाने खत्म हो गए हैं.

समय के साथ कम होती गईं चीनी मिलें

1947 से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें हुआ करती थीं लेकिन आज लगभग 10 चीनी मिलें ही ठीक हैं. उसका भी स्वामित्व सरकार के पास नहीं बल्कि प्राइवेट कंपनियों के पास है. उस वक्त बिहार देश के कुल चीनी उत्पादन में 40 फीसदी का योगदान करता था. अब यह घटकर बमुश्किल 4% रह गया है.

 

बिहार कृषि विभाग में 33 साल काम कर चुके अरुण कुमार झा बताते हैं कि, ‘आजादी से पहले बिहार में कई सरकारी चीनी मिलें थीं. लेकिन सरकार की उपेक्षा और समय पर उसे आधुनिक न बना पाने के कारण 1952-54 आते-आते चीनी मिलों को प्राइवेट कंपनियों को दिया जाने लगा. जिसमें बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह द्वारा स्थापित वारिसली गंज चीनी मिल भी शामिल था. बता दें कि इस चीनी मिल को वर्ष 1976 में सबसे ज़्यादा चीनी के उत्पादन के लिए भारत सरकार ने स्वर्ण पदक से भी नवाजा था.

अरुण कुमार झा बताते है, ‘1965-66 तक बिहार के निजी मिल मालिकों ने पूरी तरह से चीनी उद्योग पर नियंत्रण कर लिया था. चीनी का उत्पादन बहुत होता था, जिस वजह से उसका दाम कम था. अधिक फायदे के लिए निजी कंपनियों ने चीनी के उत्पादन में कमी करनी शुरू कर दी. इस बीच चीनी मिल मालिकों और सरकार के बीच टकराव भी हुआ. फिर 1972 में, केंद्र सरकार के द्वारा चीनी निगरानी समिति का गठन हुआ और 1977 से 1985 के बीच बिहार सरकार ने करीब 15 से अधिक चीनी मिलों का अधिग्रहण कर लिया था. फिर गन्ने की खेती में कमी आना और उसकी जगह गेहूं के उत्पादन का शुरू हो जाना भी कंपनियों के घाटे के लिए जिम्मेदार बनी. हालत आज भी जस की तस बनी हुई है.’

 

1992-93 में ही सबसे पहले दरभंगा की सकरी मिल बंद हुई. फिर 1993 में तत्कालीन लालू सरकार ने घाटे का सौदा बतलाकर वारिसलीगंज चीनी मिल पर ताला जड़ दिया था. तब से आज तक यह चीनी मिल फिर से शुरू होने की बाट जोह रही है.

 

2014 में जब नरेंद्र मोदी नवादा ज़िला मुख्यालय के आईटीआई ग्राउंड में चुनावी जनसभा को संबोधित करने आए थे, तब उन्होंने भी कहा था कि आखिर वारिसलीगंज चीनी मिल से दशकों से धुंआ क्यों नहीं निकला है? नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 8 साल बीत गया है. बिहार में भी बीजेपी की 5 साल सरकार रही है. इसके बावजूद अभी तक कुछ नहीं हुआ.

 

बिहार के समस्तीपुर जिला के वेद प्रकाश गन्ने की खेती करके गुड़ बनाते है. वो बताते हैं कि, ‘दादा बताते थे कि हमारे घर का गुजर-बसर इसी चीनी मिल से चलता था. लेकिन आज वहां श्मशान बना हुआ है. 2013-2014 यानी नीतीश कुमार के शासनकाल में यहां की सारी मशीनें-पुर्जे ट्रकों में लाद कर ले जाए गए. अब तो मिल का भी निजीकरण कर दिया गया है. पता नहीं अब दोबारा चीनी मिल खुलेगी या नहीं. मिल बंद होने के बाद पापा खेत बटैया पर लेकर गन्ना की खेती करके गुड़ बनाकर बेचा करते थे. हम भी वही कर रहे हैं. हालांकि, सरकार द्वारा मिल बनने का ऑर्डर दे दिया गया है लेकिन मिल अभी तक बनकर तैयार नहीं हुई है.

 

राजनीतिक कारणों से भी उद्योंगों की हालत हुई खराब

बिहार के नामचीन ब्लॉगर और प्रोफेसर रहें रंजन ऋतुराज बताते है, कि ‘सन 1960 से सन 1990 के 30 सालों में बिहार में 25 मुख्यमंत्री बने और 4 बार राष्ट्रपति शासन लगा. जबकि सन 1990 से सन 2020 के 30 सालों के बीच सिर्फ 4 मुख्यमंत्री बने और 2 बार राष्ट्रपति शासन लगा.

 

1990 के बाद बिहार सामंतवाद और समाजवाद के बीच पिसता रहा. सन 1960 में बिहार और महाराष्ट्र के प्रति व्यक्ति आय में दोगुने का अंतर था, ₹ 215 / ₹400. सन 2020 आते आते यह बढ़कर करीब 8 गुना हो गया. सन 1990 के बाद से बिहार से पलायन करने वाले लोग वापस नहीं लौट रहे.  जिन लोगों को थोड़ी बहुत भी सहूलियत मिल रही है वे लोग बाहर ही बस जा रहे हैं

 

मिथिला छात्र संगठन के प्रणव मिश्रा का कहना है, ‘लालू प्रसाद यादव समाजवाद को मजबूत करने के चक्कर में उद्योगों को भूल ही चुके थे. फिर उद्योग के नाम से चुनाव जीतकर आए नीतीश कुमार एक जिला और एक जात के मुख्यमंत्री बनकर रह गए.’

 

बिहार में क्यों नहीं आ रहा निवेश?

बिहार के सहरसा जिले के अतुल अमित एनआइटी जमशेदपुर से बीटेक और आईआईएम रोहतक से एमबीए करके अभी अमेरिकन कंसल्टिंग एजेंसी ‘EY’ में काम कर रहें है. वो जल्द ही अपनी कंपनी की शुरुआत करने वाले है. जिसके लिए उन्होंने बिहार के भागलपुर शहर में जमीन भी ले ली है. अतुल अमित ने बताया, ‘हम लोग बहुत जल्द ही अपनी कंपनी की शुरुआत करेंगे. जिसके लिए कई जगह जमीन भी ली गई है. कुछ दिन पहले बिहार सरकार जिस तरीके से इंडस्ट्री पर ध्यान दे रही थी उसे देखकर हम लोग बहुत उत्साहित हुए थे. फिर सरकार बदलने के बाद मीडिया बिहार को जिस तरह से जंगलराज के रूप में दिखा रही है, उससे हम लोगों को डर लग रहा है. वह कहते हैं कि सवाल यह नहीं है कि मीडिया सही खबर बता रही है या गलत, बल्कि सवाल यह है कि इन खबरों को देखने के बाद जल्दी कोई यहां उद्योग लगाने को तैयार नहीं होगा.

 

‘कोई बिहारी बिहार में अपनी गाढ़ी कमाई से बिहार में फैक्ट्री लगाए, यह यहां के लोगों की कल्पना से परे है. बिहार में जन्मे वेदांता ग्रुप के अनिल अग्रवाल जब अपनी नई प्रस्तावित 1.50 लाख करोड़ का निवेश करना चाहते हैं तो महाराष्ट्र और गुजरात में होड़ लग जाती है लेकिन बिहार सरकार इसमें कोई रुचि नहीं दिखाती.

 

भारत की कई बड़ी दवा कंपनियों के मालिक बिहार से हैं, उनमें से एक एरिस्टो दवा कंपनी के मालिक किंग महेंद्र ने नीतीश कुमार की आजीवन पैसों से मदद की लेकिन ऐसा लगता है कि आज तक नीतीश कुमार ने उनसे बिहार में फैक्टरी लगाने का आग्रह नही किया.

 

शाहनवाज से जगी थीं उम्मीदें

भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में तत्कालीन उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन की हो रही थी. वह बिहार और बिहार से बाहर इन्वेस्टर्स मीट करके उद्योगपतियों को राज्य में निवेश करवाने की जद्दोजहद जुटे थे.

 

सूचना मंत्रालय बिहार में कार्यरत सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव शिवम झा इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के कई इन्वेस्टर्स मीट में शामिल हो चुके हैं. वह बताते हैं कि, ‘मंत्री के रूप में शाहनवाज जी और प्रधान सचिव के रूप में संदीप पौंड्रिक जी बेहतरीन काम कर रहे थे. दिल्ली में हुए बिहार इंवेस्टर्स मीट में टेक्सटाइल और गारर्मेंट्स की देश की कई बड़ी मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट कंपनियों के एमडी शामिल हुए थे. इंवेस्टर्स मीट में जुटे तमाम उद्योगपतियों ने बिहार की पॉलिसी और राज्य उद्योग के लिए उठाए गए कदमों की प्रशंसा की. संदीप पौंड्रिक अभी भी नए मंत्री के सहयोग से इस काम में जुटे हुए हैं.’

 

(लेखक द्वारा व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(सौजन्य से: दिप्रिंट)

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